रविवार, 18 मई 2014

मन और पलाश

 

मन पलाश बन बैठा मेरा
रहा दहकता तन शाखों पर
एक रेनू की धूसर अग्नि
बहक गया वोह संग सुरभि के

गाछ गाछ में चिंगारी है
हवा ना देना जल जाओगे
धधक रही है मन अंतस में
छुपी हुयी अग्नि बेचारी 

 

अभी तलक तो बंधी हुयी है
दल पुष्पित की  शाख जुडी है
छोड़ेगी तन जब ये अपना
उड़ जायेगी पंख बदल के

 

दावानल की ये अनुयायी
ताप है पीती दाह में जीती
बन पलाश जीवन के पथ पर
शीत अग्नि मन के गीतों सी


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