मन और पलाश
मन पलाश बन बैठा मेरा
रहा दहकता तन शाखों पर
एक रेनू की धूसर अग्नि
बहक गया वोह संग सुरभि के
गाछ गाछ में चिंगारी है
हवा ना देना जल जाओगे
धधक रही है मन अंतस में
छुपी हुयी अग्नि बेचारी
अभी तलक तो बंधी हुयी है
दल पुष्पित की शाख जुडी है
छोड़ेगी तन जब ये अपना
उड़ जायेगी पंख बदल के
दावानल की ये अनुयायी
ताप है पीती दाह में जीती
बन पलाश जीवन के पथ पर
शीत अग्नि मन के गीतों सी
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