शनिवार, 24 मई 2014

हे ! पुष्प

स्वर्ण कुसुम तुम मत खिलना अब
कोई राजकुमार नहीं है
जो अपनी प्रेयसी की खातिर
ले आयेगा तुम्हें तोड़ कर

अब उपवन में बन मृग की
कस्तूरी की गंधों से सुवासित
पुष्प खिलेंगे मतवाले से
नाम गाँव कुछ पता नहीं है

बस उनको नयनो में कैद कर
बांधेंगे मन के बयार से
जब तक गाँठ खोल कर ऐसे
निशा सुवासित हम कर लेंगे

शबनम की बूंदों को छू कर
नयन निमीलित सजल बूँद से
खुशी और दुःख के मिश्रण को
ज़रा घोल कर हम पी लेंगे

हे ! वन के सुरभित आभरणित
निशा गहन या दग्ध दिवाकर
खिलना हरदम वसुन्धरा पर
रहो स्वतंत्र रहो आच्छादित

शुक्रवार, 23 मई 2014

प्रकृति का कैमरा

कितने भी तुम यन्त्र लगा लो
संचालित कर तार वार से
बिना बैटरी नहीं चलेगा
या फिर किरणों से उधार ले

कितने यंत्र रोज बनते हैं
कितनी फिल्मे ३डी, Hडी
पर क्या जीत सका है कोई
इस  प्रकृति का अपना नुस्खा

मैंने भी एक चित्र था खींचा
दो मंजिल के ऊपर जाकर
नीचे पेड़ की छाया थी जो
पत्ती पत्ते का तन हिलता

क्या प्राकृत का नया कैमरा
कितने पिक्सल का वो होगा
वही छवि गतिमान है रहती
या फिर शांत मूर्ती मौन सी

हम मानव उल्झे है ऐसे
तेरी मेरी चीज है अच्छी
पर मेरे शब्दों में गुंथकर
ऊपर वाले को भी सोचो


बुधवार, 21 मई 2014

पुष्प का जीवाश्म


दबा हुआ था पुष्प वो कबसे
मेरे हाथों से ही समर्पित
मैंने ही खुद को अर्पित कर
उसे सहेजा था जीवन भर

आज वो पन्ने फटे फटे से
झाँक रहा जीवाश्म पुष्प का
आतुर था अंतिम सांसों में
अपनी व्यथा रेख में खिंच कर

अलग नहीं थे उसके दल तब
माना की निष्प्राण नहीं था
फिर भी उसकी अंतिम इच्छा
का मुझको संज्ञान नहीं था

मैंने उसके रूप को खींचा
मन की यादों से फिर सींचा
शायद अब वो ना महकेगा
पुष्प रहेगा नाम तो उसका !

गूलर की खुशबू


याद है मुझे गाँव का घर,
चारों तरफ खेतों से घिरा हुआ
खपरैलों की छत
सामने खूबसूरत सा कुवां

कुछ दूर पर आम की बाग़,
महुवे की खुशबू से सराबोर
बढहल के फलों की मिठास खटास,
और वो कुमुदुनी का तालाब

मगर मेरा प्रिय वो अकेला पेड़
हरे हरे धान की फसल हो
या गेंहूँ , मटर ,चने से आच्छादित धरा
वो अकेला गूलर का पेड़

जाने कबसे खडा था प्रहरी की तरह
छुट्टियों में हमारे लिए तकता
हम उससे ही पहले मिलते थे
उससे पूछते थे कैसे हो तुम

ठहरना अभी सामान रख कर आयेंगे
बैठेंगे तुम्हारी छाँव में
तुम्हारे कच्चे पके फलों को चखना है
मगर इस बार अपने फूल दिखाना जरूर

ओ गूलर तुम आज होगे क्या,
मैं बहुत दूर हूँ तुमसे
तुमसे जुड़ा है मेरा बचपन
मेरा बालमन , मेरी यादें

आज भी मन पुकारता है तुम्हें
क्या तुम्हें उस जीवन से मुक्ति मिल गयी ?
क्या तुम आस पास नए जीवन में हो
मगर वो जगह !मुझे वापस आना है तुमसे मिलने


कुछ पंखुरियां फूलों की थी

कुछ पंखुरियां फूलों की थीं
बिखरी इधर उधर धरती पर
जाने किसने केश राशि से
फिसलाया था बहक बहक कर

कुछ पंखुरियां पुष्पित मन सी
महक रही थीं मन में मेरे
जाने कौन पास से   गुजरा
महक गया था उपवन तीरे

कुछ पंखुरियां जल के ऊपर
तिर कर शांत स्वच्छ मदमाती
वो अतीत की याद में डूबीं
पार उतरने को हैं आतुर

कुछ पंखुरियां महक रही हैं
पान गिलौरी के दरवाजे
अबला के श्रृंगार सजे हैं
नाम मात्र जीवन के धागे

मगर पुष्प तो पुष्प रहेगा
हो पंखुरी बिखर कर जो भी
नैन नेह तो बरसेंगे ही
कोमल तन के अंतिम पथ में

सोमवार, 19 मई 2014

सोने के झूमर हैं जैसे


सड़क निरी सोयी है कबसे
इक्का दुक्का टायर घिसती
रात में शबनम धो देगी फिर
धूल दिवस की रात को फिर से

सुबह गेंद सा सूरज होगा
कच्चे रंगों से रंगा सा
धुल जायेगी सारी लाली
भीगेगा जब जल की रश्मि से







नव श्रृंगार धरा का होगा
झूमर जब पलाश ले आये
नव्या सी धरती के ह्रदय पर
स्वर्ण भस्म सा नेह विछाये

सुरभि रात जब मस्त हुयी थी

 करके  ठिठोली पुष्प गाछ से
हंस हंस कर बिखरी थी धरा पर
रूप राशि दल के आँचल सी

पुष्प आभरण पहन शाकुंतल
मिली थी जब दुष्यंत से अपने
वही पलाश दग्ध था तब भी
सोने की चिड़िया थी शाख पर

रविवार, 18 मई 2014

मन और पलाश

 

मन पलाश बन बैठा मेरा
रहा दहकता तन शाखों पर
एक रेनू की धूसर अग्नि
बहक गया वोह संग सुरभि के

गाछ गाछ में चिंगारी है
हवा ना देना जल जाओगे
धधक रही है मन अंतस में
छुपी हुयी अग्नि बेचारी 

 

अभी तलक तो बंधी हुयी है
दल पुष्पित की  शाख जुडी है
छोड़ेगी तन जब ये अपना
उड़ जायेगी पंख बदल के

 

दावानल की ये अनुयायी
ताप है पीती दाह में जीती
बन पलाश जीवन के पथ पर
शीत अग्नि मन के गीतों सी