मुझे तुम याद आते हो,
काश! मैं रोक सकती निर्मम हत्यारों को,
तुम्हारी छाँव मेरा बचपन
निवाला खूब भाता था
तुम्हारी पत्तियों का संग
मुझे नटखट बनाता था
सुबह कलरव पछियों का
रोज मुझको जगाता था
हवा के झोंके दे थपकी
रोज मुझको सुलाता था
आज निरीह से हो तुम
ये अहसास है मुझको
मगर विश्वास है मुझको
नयी कोपल से जागोगे...
लौट आओ लौट आओ
तुम्हारी संगिनी हूँ मैं
मिलूंगी मैं येही पर ही
ज़रा सी अब बड़ी हूँ मैं

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